आत्मा

जीव का सत्य

आत्मा का सत्य

परमात्मा

आत्म सत्य

सत्चिदानन्द परमात्मा

आत्म भेद

माया

आत्मा का स्वरुप

निर्गुण निराकार

आत्म पाश

माया

आत्म दर्शन साधन

सत संग

आत्म मुक्ति साधन

समर्पित सत्य

आत्म बंधन

आत्मा तीन बन्धनों से जकड़ी है
स्थूल सूक्ष्म व् कारण
स्थूल, मुक्ति साधन मृत्यु
शुक्ष्म, मुक्ति साधन ज्ञान
कारण, मुक्ति साधन समर्पण

आत्म तत्व

स्थूल शरीर में ही शुक्ष्म शरीर का वास होता है जहा कारन स्थान में आत्मा का केंद्र स्थित होता है
आत्मा पूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है जैसे परमात्मा ब्रह्माण्ड में
देह परिवर्तन आत्मा के मज़बूरी है
देह पा कर आत्मा हर्ष गति को प्राप्त होती है क्यों की यह एक समागम स्थल भी है
आत्मा का आत्मा से मिलन मात्र देह संयोग से ही संभव है
पर आत्मा परमात्मा का मिलन सत्य संयोग से ही सम्भव है
आत्मा को परमात्मा के मार्ग पर ही सत्य की अनुभूति होती है
सत्य की अनुभूति से ही परमार्थ सिद्ध होता है जहा आत्मा आत्मानंद को प्राप्त होती है जो परमानन्द की प्रथम चरण है
सत्य आचरण व् सत्य निष्ट गुरु कृपा से जीव स्थूल देह में रहते हुए ही शुक्ष्म को सिद्ध कर कारन तक पहुचता है और सत्य की धरोवर से समर्पण को रूप दे कर परमात्म तत्व को प्राप्त करता है

मुक्ति पथ

आत्मा सदेव माया के प्रति आकर्षित रहती है यही उसके मोह व् बंधन का कारण है, इसी आकर्षण के कारण माया आत्मा को अपने आकर्षण में कैद कर लेती है
परमात्मा की और आकर्षित हो आत्मा स्वयं को माया से मुक्त कर सकती है पर वह कदापि मुक्ति चाहती ही नहीं पर सुखो के उपभोग में आसक्ति प्रगट कर पुनः पुनः जन्म व् मृत्यु को स्वीकार करती है
कदापि आत्मा यदि मुक्त हना भी चाहे तो माया की शक्ति अपार है वह माया के आकर्षण से भी कई गुना ज्यादा है यही आत्मा की विवशता है
जब भी आत्मा परमात्मा की ओर आकर्षित होती है माया उसे साधन सुख व् भाव विभोरे कर पुनः लोटा लेती है
जब आत्मा सत्य से परिपूर्ण हो जाती है तब माया विवश हो सकती है उसे मुक्त करने हेतु
परमात्मा से प्रेम ही आत्मा के केंद्र बिंदु में सत्य रूपी सूर्य उदय का कार्य करता है जो आत्म प्रकाश, आत्म ज्ञान व् आत्म दर्शन से साक्षात्कार कर उसे मुक्ति पथ पर ले जाता है
जय श्री कृष्ण

आत्मा ज्ञान का विषय है

आत्मा देह दनित कर्म नहीं अपितु समर्पण का विषय है

आत्मा की माया से युक्ति ही देह धारण का कारण बनती है

आत्मा परमात्मा व् परमात्मा की दिव्या शक्ति माया दोनों की और आकर्षित हो सकती है

माया साधन सुख की धनी व् परमात्मा ब्रह्मा सुख का सूत्र है

आत्मा का केंद्र अहंकार में निहित है इसी कारण वह माया की और प्रभावित हो कर देह धारण कर सुख व् दुःख का पात्र बनती है

यही आत्मा जब ब्रह्म की और आकर्षित होती है तो ब्रह्म सुख में लीन हो मोक्ष की गति को प्राप्त करती है यहाँ समर्पण की ही सत्ता है

जीव कदाचित ब्रह्मा के अति समीप पहुच कर भी मोक्ष से वंचित रह जाता है की वह अपनी स्वयं की गति को निर्मूल नहीं करता

आत्मा भू लोक का भोग पञ्च भूत जनित शारीर धारण कर करती है पर दुःख सुख के भोग उसे शारीर त्याग कर भी शुक्ष्म शारीर से प्राप्त होते है जैसे जीव स्वप्न में सुख व् दुःख की अनुभूति करती है अतार्थ जीव मृत्यु उपरांत भी भी सुख दुःख का भागी रहता है

आत्मा का मूल वाहन कारण शरीर है जो नियत अहंकार से निर्मित है जिसकी कोई भोतिक सत्ता तो नहीं पर परोपूर्ण रूप से आत्मा के बंधन का कारण है

कारण शरीर से मुक्ति ही जीव को पञ्च मुक्ति कोष तक ले जाती है जहा जीव मात्र भक्ति प्रेम व् समर्पण से ब्रह्मा गति को प्राप्त होता है जिसे केवलम मोक्ष की संज्ञा प्राप्त है

No posts. Show all posts
No posts. Show all posts